पुस्तक समीक्षा- हाउस हसबैंड

पुस्तक समीक्षा:-

पुस्तक: हाउस हसबैंड (उपन्यास)

लेखक: सुरजीत मान जलईया सिंह

प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष: 2026

मूल्य : ₹399 ( सजिल्द) 

समीक्षक - बबिता कुमावत

 

 

सुरजीत मान जलईया सिंह द्वारा रचित उपन्यास 'हाउस हसबैंड' (श्वेतवर्णा प्रकाशन) जिसका नाम सुनते ही मन में उसे पढ़ने की जिज्ञासा मन में भर आई, जिस उपन्यास का शीर्षक ही एक नये विषय के केन्द्र के इर्द-गिर्द बुना हो और वह जिस सहजता से एक चित्र हमारे सामने खींचता है वह वर्तमान समाज के नये गठन में अवश्य ही सहायक सिद्ध हो सकता है। 

 समकालीन मध्यमवर्गीय पारिवारिक ताने-बाने, लैंगिक रूढ़ियों और पुरुष के आंतरिक मनोविज्ञान की जटिल परतों को उघाड़ने वाली एक बेहद संवेदनशील एवं विचारोत्तेजक कृति है। जहाँ आज का विमर्श प्रायः स्त्री की स्वावलंबिता और उसके संघर्ष तक सीमित रहता है, वहीं यह उपन्यास उस अनदेखे पहलू को केंद्र में लाता है जहाँ एक पुरुष पारंपरिक परिभाषाओं से बाहर निकलकर घर और परिवार का आधार बनता है। 

 

कथानक एवं विषय-वस्तु उपन्यास की कथा 'मान' और 'मोनिका' के वैवाहिक जीवन पर आधारित है। मोनिका एक उच्चकुलीन, शिक्षित और कामकाजी महिला है, जबकि मान एक संवेदनशील मध्यमवर्गीय पुरुष है। वकालत और नौकरी की आपाधापी से अलग होकर मान घर, रसोई और बच्चों की परवरिश की ज़िम्मेदारी पूरी निष्ठा से संभालता है। उपन्यास का मूल द्वंद्व यहीं से शुरू होता है—हमारा समाज पुरुष के मूल्य का निर्धारण केवल उसके पद, वेतन और सामाजिक प्रतिष्ठा से करता है। ऐसे में जब मान 'हाउस हसबैंड' की भूमिका चुनता है, तो समाज उसे सराहना देने के बजाय आलसी, नकारा और परनिर्भर ठहराने लगता है। 

 

मानसिक द्वंद्व और प्रमुख प्रतीक लेखक ने पुरुष के अंतर्मन में चलने वाले मौन युद्ध को बेहद सूक्ष्मता से चित्रित किया है। मान का संघर्ष बाहरी दुनिया से कम और अपने भीतर के संस्कारों, पिता की अपेक्षाओं और 'ख्वाहिशों की धीमी मौत' से अधिक है। 

जली हुई रोटी: उपन्यास में पहली बार रोटी का जल जाना केवल एक रसोई की चूक नहीं है, बल्कि यह पुरुष के अहंकार, संशय और सामाजिक दबाव के बीच के घर्षण का गहरा प्रतीक है। 

 

भीतरी कोठरी: घर का स्टोर रूम मान के लिए उसकी 'भीतरी कोठरी' बन जाता है, जहाँ वह अपनी अधूरी वकालत, पुरानी स्मृतियों और अनकहे आंसुओं के साथ आत्ममंथन करता है। 

अनचाहे कैमरे: लेखक ने समाज की निगरानी रखने वाली नज़रों और तानों को 'अनचाहे कैमरों' का रूपक दिया है, जो बिना किसी तकनीक के लगातार रिश्तों में संदेह और असुरक्षा बोते रहते हैं। 

 

पात्रों का यथार्थवादी चित्रण उपन्यास के पात्र किसी काल्पनिक आदर्शवाद पर नहीं टिके हैं। मान एक सामान्य इंसान है, जो अपनी कमजोरियों, डर और तन्हाई के साथ जीता है। दोपहर के समय खाली घर में पुरुष का अकेलापन और बिना किसी श्रोता के उसका मौन दर्द पाठक को झकझोरता है। वहीं, मोनिका का चरित्र केवल एक कामकाजी पत्नी का नहीं, बल्कि एक समझदार और सशक्त साथी का है जो मान को उसकी सामाजिक हैसियत से नहीं, बल्कि उसके समर्पण और आंतरिक गरिमा से आँकती है। 

सामाजिक दोहरेपन पर प्रहार उपन्यास समाज के दोहरे चरित्र को बेनकाब करता है। 

मान अपनी डायरी में लिखता है कि समाज चाहता है कि स्त्री अपने पैरों पर खड़ी हो और कमाए, लेकिन जब एक पुरुष घर संभालता है, तो वह खुलकर खुद को 'हाउस हसबैंड' नहीं कह पाता। पड़ोसी और रिश्तेदार उस गिद्ध की तरह बन जाते हैं जो किसी व्यक्ति की कमज़ोरी या असामान्य निर्णय पर अपनी ज़ुबान से उसकी देह उधेड़ देते हैं। 

 

शिल्प, भाषा और निष्कर्ष आत्मकथात्मक और मनोवैज्ञानिक डायरी-शैली में लिखा गया यह उपन्यास सीधे पाठक के दिल में उतरता है। भाषा अत्यंत सहज, काव्यात्मक और दार्शनिक है। मान का अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार करना और यह समझना कि "सच्चा मूल्य बाहर की अदालतों में नहीं, बल्कि भीतर की शांति और परिवार की स्थिरता में है," कहानी को एक परिपक्व ऊंचाई देता है। 'हाउस हसबैंड' केवल एक घरेलू कहानी नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, बराबरी और सच्चे मानवीय प्रेम का एक सशक्त दस्तावेज़ है।

 

 

समीक्षक परिचय -

 

बबिता कुमावत(सहायक प्रोफेसर) 

शिक्षा -एम ए. बी एड. नेट, पीएचडी शोधार्थी,

ई मेल- bkumawatbarni13@gmail.com

 

संप्रति –

सहायक प्रोफेसर, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नीमकाथाना, सीकर(राजस्थान)

 


तारीख: 31.08.2026                                    बबिता कुमावत




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